"ज़िंदगी की ग़म की बारिश" (Zindagi ki Gham ki Barish)
"ज़िंदगी की ग़म की बारिश"
जब रात आंधी चली, और धूप छाई थी,
जब चांदनी चिढ़ा थी, और सूनी रात आई थी।
मन में उदासी छाई, दिल में गहराई थी,
इस बेदर्द ज़िंदगी में, खो गई खुशियों की लड़ाई थी।
क्या कहूँ कितनी तन्हाई है, ये ज़िंदगी की माया है,
आँखों में आंसू हैं, दिल में गम की ढायी है।
हंसते हुए चेहरे के पीछे रूला देने वाली आँखें हैं,
जिन्दगी की इस मस्ती में, रूह की ज़िंदगी बँधी है।
दिल के संगीनों में छुपे हैं तराशे दर्द के निशान,
आँधियों की छावं में, बैठा है ये लम्हा निर्झर।
मोहब्बत की बारिश में, भिगोता है ये दिल आज़ान,
खुद से हार गया है, ख़ुदा की मोहब्बत के आगे।
ये ज़िंदगी की ग़म की बारिश, जो बरसती है रोज़,
हर रोज़ नयी आँखों में, नया दर्द साथ लेकर आती है।
बस अब बहुत हो गई, इस दर्द की मुद्दत आज़,
कहाँ है वो राहत की जगह, जहाँ से हंसी फिर आती है।
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